गद्यांश के आधार पर प्रश्न का उत्तर दें। छठी सदी के उत्तरार्द्ध से लेकर दसवीं…
2025
गद्यांश के आधार पर प्रश्न का उत्तर दें।
छठी सदी के उत्तरार्द्ध से लेकर दसवीं सदी तक दक्षिण भारत में अनेक संतों ने भक्ति आंदोलन का विस्तार किया। इन संतों की भक्ति विशुद्ध प्रेम पर आधारित थी। इनके उपास्य देव शिव और विष्णु थे। ये संत नयनार (जो शिव के भक्त थे) और आलवार (जो विष्णु के भक्त थे) के नाम से प्रसिद्ध हुए। नयनार और आलवार संतों ने जैनियों और बौद्धों के अपरिग्रह को अस्वीकार कर ईश्वर के प्रति व्यक्तिगत भक्ति को ही मुक्ति का मार्ग बताया। इन संतों में ब्राह्मण के साथ-साथ निम्न जातियों के भी कई संत थे। उनमें अंदाल नामक एक महिला संत भी थीं। नयनारों और आलवारों के आक्रमण का प्रमुख लक्ष्य बौद्ध धर्म और जैन धर्म थे। आम जनता को अपने साथ लाने में नयनार एवं आलवार संतों को सफलता मिली। इन संतों ने स्थानीय मिथकों एवं गाथाओं का सहारा लिया। उनकी भाषा आम लोगों की भाषा (तमिल एवं तेलुगू) थी। लोगों का विश्वास और स्थानीय शासकों के समर्थन से यह आंदोलन पूरे दक्षिण भारत में फैल गया।
दक्षिण भारतीय संतों की भक्ति का आधार था---
Answer: B. प्रेम — छठी से दसवीं सदी के बीच दक्षिण भारत में फैले भक्ति आंदोलन का मूल सिद्धांत यह था कि ईश्वर (शिव अथवा विष्णु) के प्रति गहरा, वैयक्तिक एवं निःस्वार्थ प्रेम ही…
- A.
श्रद्धा
- B.
प्रेम
- C.
कर्मकांड
- D.
पाखंड
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Correct answer: B
छठी से दसवीं सदी के बीच दक्षिण भारत में फैले भक्ति आंदोलन का मूल सिद्धांत यह था कि ईश्वर (शिव अथवा विष्णु) के प्रति गहरा, वैयक्तिक एवं निःस्वार्थ प्रेम ही मुक्ति का मार्ग है — न कि जटिल कर्मकांड, बाह्य अनुष्ठान अथवा जाति-आधारित विशेषाधिकार। यह मार्ग जैन एवं बौद्ध धर्म के अपरिग्रह (त्याग) पर आधारित मार्ग से भिन्न था, और नयनार (शैव) तथा आळवार (वैष्णव) संतों द्वारा तमिल एवं तेलुगू जैसी लोकभाषाओं में फैलाया गया।
गद्यांश में स्पष्ट रूप से कहा गया है, "इन संतों की भक्ति विशुद्ध प्रेम पर आधारित थी।" इसी पंक्ति से प्रश्न का सीधा उत्तर मिलता है — दक्षिण भारतीय संतों की भक्ति का आधार प्रेम था। गद्यांश में आगे यह भी बताया गया है कि इन संतों ने जैनियों और बौद्धों के अपरिग्रह को अस्वीकार कर ईश्वर के प्रति व्यक्तिगत भक्ति को ही मुक्ति का मार्ग बताया, जो प्रेम-केंद्रित इस भक्ति-भावना की पुष्टि करता है।
गद्यांश में कहीं भी भक्ति का आधार कर्मकांड (अनुष्ठान) अथवा पाखंड (दिखावा) नहीं बताया गया है; इसके विपरीत, संतों ने जाति एवं बाह्य कर्मकांड से ऊपर उठकर सीधे ईश्वर से वैयक्तिक जुड़ाव पर बल दिया, जो अकेले श्रद्धा (सम्मान के भाव) से भी आगे की एक गहन भावनात्मक अवस्था है। अतः गद्यांश द्वारा प्रत्यक्ष रूप से समर्थित उत्तर 'प्रेम' है।