Comprehension: गद्यांश के आधार पर प्रश्न का उत्तर दें। द्विवेदी युग की…

2025

Comprehension:

गद्यांश के आधार पर प्रश्न का उत्तर दें।

द्विवेदी युग की काव्यधारा की मूलधारा देश-भक्ति है।

इस युग के कवियों ने समस्त जनता, विद्यार्थी, मजदूर, स्त्री, पुरुष, बूढ़े तथा बच्चों आदि को भी स्वतंत्रता एवं समृद्धि के लिए प्रेरित किया।

कवियों का विशेष आग्रह सांप्रदायिक समन्वय में दिखाई पड़ता है, क्योंकि देश की उन्नति के लिए सभी जातियों का सच्चा मेल आवश्यक है।

हरिऔध जी अपने युग के सच्चे कलाकार हैं तथा खड़ी बोली के कवि माने जाते हैं।

युग के प्रतिनिधि कवि वही हो सकता है जिसकी रचना में नवीन विचारों का समावेश हो तथा सभी से समन्वय किया हो।

हरिऔध जी का युग इतिवृत्तात्मकता एवं उपदेशात्मकता का युग था।

उस समय की रचनाओं में उपदेशात्मक प्रवृत्ति को महत्त्व दिया जाता था, अतः हरिऔध जी की रचनाओं में भी इन प्रवृत्तियों का होना स्वाभाविक है।

उन्होंने जो भी विषय अपनाये, उनमें से अधिकांश विश्लेषणात्मक हैं।

प्रिय प्रवास तथा वैदेही वनवास दोनों ही महाकाव्य हैं और दोनों ही पौराणिक हैं, इतिवृत्तात्मक एवं उपदेशात्मक शैली की दृष्टि से सर्वोत्कृष्ट हैं।

द्विवेदी युग की काव्यधारा का मूल प्रतिपाद्य क्या है ?

Answer: C. देश - भक्तिसंकल्पना: गद्यांश-आधारित प्रश्नों में जब किसी काव्यधारा या युग के 'मूल प्रतिपाद्य' अथवा केंद्रीय भाव के बारे में पूछा जाता है, तो उत्तर प्रायः गद्यांश के किसी…

  1. A.

    सामाजिकता

  2. B.

    स्वतंत्रता

  3. C.

    देश - भक्ति

  4. D.

    राजनीति

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Correct answer: C

संकल्पना: गद्यांश-आधारित प्रश्नों में जब किसी काव्यधारा या युग के 'मूल प्रतिपाद्य' अथवा केंद्रीय भाव के बारे में पूछा जाता है, तो उत्तर प्रायः गद्यांश के किसी एक निर्णायक वाक्य में प्रत्यक्ष रूप से घोषित होता है — शेष विवरण, उदाहरण और तथ्य उसी घोषित भाव के समर्थन या विस्तार के रूप में आते हैं। ऐसे प्रश्नों की विधि है: गद्यांश के आरंभिक/निर्णायक वाक्य में की गई सीधी घोषणा को पहचानना, फिर शेष सामग्री का उससे संबंध जाँचना।

अनुप्रयोग: गद्यांश का पहला वाक्य ही सीधे उत्तर देता है — 'द्विवेदी युग कि काव्यधारा की मूलधारा देश-भक्ति है।' इसके बाद के सभी कथन — समस्त जनता, विद्यार्थी, मजदूर आदि सभी वर्गों को प्रेरित करना, सांप्रदायिक समन्वय पर बल, सभी जातियों के सच्चे मेल की आवश्यकता, तथा हरिऔध जी की इतिवृत्तात्मक-उपदेशात्मक रचनाएँ (प्रिय प्रवास, वैदेही वनवास) — इसी आरंभिक घोषित भाव के विस्तार और समर्थन के उदाहरण हैं, कोई स्वतंत्र प्रतिपाद्य नहीं। अतः प्रश्न का उत्तर उसी आरंभिक घोषित कथन से सीधे प्राप्त होता है।

पुनः-जाँच: शेष विकल्पों की जाँच करें — सामाजिकता (जातीय एकता का भाव, प्रसंगवश उल्लेखित), स्वतंत्रता (जन-प्रेरणा का लक्ष्य, प्रसंगवश उल्लेखित), राजनीति (गद्यांश में कहीं अनुल्लेखित) — इनमें से किसी को भी गद्यांश ने युग की काव्यधारा की 'मूलधारा' के रूप में घोषित नहीं किया; केवल इसी एक भाव को प्रत्यक्ष रूप से गद्यांश के पहले वाक्य में यह विशेषण मिला है। इस प्रकार गद्यांश के अपने कथन से ही उत्तर की पुष्टि हो जाती है।

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